गुमसुम गुमसुम

गुमसुम गुमसुम क्यों है चेहरा
कुछ तो बोलो!
लगा हुआ है किसका पहरा
कुछ तो बोलो!

शाम सांवली बीत गयी है
रात चाँदनी आने को
रवि भी छिपकर देखरहा है
है चौखट पर जाने को
क्या! हुआ है कोई दुःख गहरा
कुछ तो बोलो!
लगा हुआ है किसका पहरा
कुछ तो बोलो!

प्रभात के पंक्षी बोल उठे हैं
कमल के पल्लव डोल उठे हैं
जल थल नभ चर सब जाग गए
अंधियारे के साथी भाग गए
बिखेर के तुम सौंदर्य सुनहरा
कुछ तो बोलो!
लगा है मुख पर किसका पहरा
कुछ तो बोलो!

गुमसुम गुमसुम क्यों है चेहरा
कुछ तो बोलो!

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