कहाँ है जीवन
जब पूरा शहर
किसी मजदूर की कांख सा
पसीजता हुआ तप रहा हो
जब हर जगह भीड़
गुप्तांग के बालों जितनी घनी हो
और उस पर व्याकुलता की चिपचिपी परत चढ़ आयी हो
जब इमारतें
तने हुए कामान्ध शिश्न की तरह
धरती के स्तनों पर फट पड़ रहीं हों
जब दुखों के पैरों की थाप
इतनी अधिक हो कि
गाँव के गाँव चींटियों की तरह बिलबिलाते भाग रहे हों
जब निराशा खसरे की तरह
उभर आई हो
पूरे संसार की देह पर
ऐसे में कहाँ तलाश करना होगा जीवन
ठंढे पाउडर के विज्ञापनों में
महकते साबुनों की बट्टियों में
यूनानी दवाओं की गुमटियों में
मरी हुई छिपकली के कंकाल में
या होम्योपैथी की सफेद गोलियों में
कहीं भी नहीं
क्योंकि जीवन असल में कुछ है ही नहीं
बस मृत्यु तक पहुँचने का माध्यम है।
© Shivam chaubey
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