तुम ही थी न

मैं इलाके के आखिरी छोर पर
झंखाड़ की तरह उगा था
तुम मेरी आस्तीन में
नीला फूल बनकर खिली थी

तुम ही थी
जिसने तितली की शक्ल में
डुबोया था मुझे रंगों में

आम मैना की तरह
तुम ही फुदक फुदक कर
बिखरा गयी थी मेरे बाल

चींटियों की कतार में भी
तुमने ही बनाया था
मेरी जड़ों में अपना घर

तुम ही थी जिसने
एक बच्ची की गेंद खो जाने पर
हिलाए थे मेरे कंधे
और सहलाई थी मेरी गोद

तुम ही थी उस शाम
बादल बनकर गिरी थी मेरे ऊपर
और भिगा गयी थी रोम-रोम

तुम ही आयी थी न
एक दिन मालिन बनकर
छाँटने के लिये मेरा अतिरिक्त
देने के लिये एक आकार

तुम ही थी न
जिसने अलग-अलग रूपों में आकर
सजाया था मुझे
दिया था अपना स्पर्श
बस यही सोचते हुए
हर आहट पर उचक-उचक कर देखता हूँ
और तुम्हारे न मिलने पर
लिखने लगता हूँ भूरी मिट्टी पर
कोई अनचीन्ही सी कविता।

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